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तीन कमरों में 254 बच्चों की पढ़ाई, तीन शिक्षकों के भरोसे चल रहा दुल्हिन मंदिर स्कूल

Category: गया | Date: 03 Nov 2026 | 👁️ Views: 20

शेरघाटी से राहुल की रिपोर्ट.. शेरघाटी अनुमंडल मुख्यालय के हटिया मुहल्ला स्थित ऐतिहासिक मध्य विद्यालय दुल्हिन मंदिर आज बदहाली का दंश झेल रहा है। कभी क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाने वाला यह विद्यालय आज बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। करीब 94 वर्ष पुराने इस विद्यालय में पहली से आठवीं कक्षा तक 254 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं, लेकिन इनके पठन-पाठन के लिए मात्र तीन शिक्षक कार्यरत हैं। विद्यालय में तीन कक्षा-कक्ष और एक कार्यालय है। कमरों की कमी और जर्जर भवन के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। विद्यालय की स्थिति यह है कि पहली से चौथी कक्षा तक के बच्चों को एक साथ, पांचवीं और छठी के विद्यार्थियों को दूसरे कमरे में तथा सातवीं और आठवीं कक्षा के बच्चों को तीसरे कमरे में बैठाकर पढ़ाया जाता है। यानी अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को एक ही कमरे में बैठाकर पढ़ाने की मजबूरी है। इससे शिक्षकों के सामने भी सभी कक्षाओं का पाठ्यक्रम सुचारु रूप से पूरा कराने की चुनौती बनी रहती है। विद्यालय में नामांकित 254 बच्चों में 219 लड़के और 35 लड़कियां हैं। **न शौचालय की बेहतर व्यवस्था, न खेलने का मैदान** विद्यालय में बच्चों के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। परिसर में खेल का मैदान नहीं है, जहां बच्चे खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों में हिस्सा ले सकें। शौचालय की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। विद्यालय में रसोइया के लिए अलग कमरा तक उपलब्ध नहीं है। मध्याह्न भोजन तैयार करने के लिए भी समुचित व्यवस्था नहीं है। बच्चों को भोजन कराने के लिए अलग स्थान नहीं होने के कारण कक्षा-कक्ष में ही बेंच पर बैठाकर मध्याह्न भोजन कराया जाता है। इससे पढ़ाई और भोजन दोनों के लिए उपलब्ध सीमित जगह का इस्तेमाल करना पड़ता है। विद्यालय भवन की स्थिति भी चिंताजनक है। पुराने भवन के कमरे जर्जर हो चुके हैं। पर्याप्त कक्षा-कक्ष, बरामदा और अन्य जरूरी संरचनाएं नहीं होने से बच्चों को काफी परेशानी होती है। एक तरफ नामांकित बच्चों की संख्या लगातार अधिक है, वहीं दूसरी तरफ उपलब्ध संसाधन उनकी जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं। **15 डिसमिल जमीन के बावजूद नए भवन का इंतजार** विद्यालय के पास करीब 15 डिसमिल जमीन उपलब्ध बताई जाती है, लेकिन पूरी जमीन विद्यालय के वास्तविक कब्जे और उपयोग में नहीं है। विद्यालय के बगल में मंदिर के नाम से खाली जमीन भी पड़ी हुई है। जमीन की स्थिति स्पष्ट नहीं होने और उसकी विधिवत मापी नहीं कराए जाने के कारण नए भवन के निर्माण का मामला अटका हुआ है। विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक युगेश प्रसाद के अनुसार, जमीन की मापी और विद्यालय भवन निर्माण की समस्या को लेकर जुलाई महीने में अंचलाधिकारी को लिखित आवेदन दिया गया था। इसके अलावा शिक्षा विभाग के अधिकारियों, प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, जिला शिक्षा पदाधिकारी और मगध प्रमंडल के आयुक्त तक को विद्यालय की स्थिति से अवगत कराया गया है। इसके बावजूद अब तक जमीन की मापी और भवन निर्माण की दिशा में ठोस पहल नहीं हो सकी है। प्रधानाध्यापक का कहना है कि विद्यालय में बच्चों की संख्या के अनुपात में कमरे और शिक्षक दोनों की कमी है। तीन कमरों में आठ कक्षाओं का संचालन करना पड़ रहा है। खेल मैदान, शौचालय और रसोइया के लिए अलग कमरे जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में बच्चों को बेहतर शैक्षणिक माहौल देना मुश्किल हो रहा है। **आजादी से पहले शिक्षा की अलख जगाता था दुल्हिन मंदिर** मध्य विद्यालय दुल्हिन मंदिर का इतिहास भी काफी पुराना है। विद्यालय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और शुरुआती दिनों की जानकारी स्थानीय निवासी विजय कुमार दत्त से मिली। उन्होंने दुल्हिन मंदिर परिसर में संचालित पुरानी पाठशाला, उसके निर्माण, तत्कालीन जमींदार परिवार और विद्यालय के स्वरूप में हुए बदलावों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। विजय कुमार दत्त के अनुसार, वर्तमान सरकारी विद्यालय के स्वरूप से पहले यहां संस्कृत पाठशाला संचालित होती थी। शेरघाटी के तत्कालीन जमींदार परिवार की गणेश कुंवर, जिन्हें स्थानीय लोग सम्मान से दुल्हिन जी कहते थे, ने दुल्हिन मंदिर परिसर में मंदिर का निर्माण कराया था। इसी परिसर में बच्चों की शिक्षा के लिए पाठशाला भी संचालित होती थी। विजय कुमार दत्त के मुताबिक, उस समय क्षेत्र में शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में तत्कालीन जमींदार डोमन बाबू ने बच्चों को पढ़ाने की पहल की थी। उन्होंने शुरुआत में कुछ बच्चों को बुलाकर पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तो उन्होंने गणेश कुंवर से विद्यालय के लिए जमीन उपलब्ध कराने का आग्रह किया। इसके बाद दुल्हिन जी ने मंदिर और पाठशाला के संचालन तथा भरण-पोषण के लिए जमीन दान की थी। उनके अनुसार, मंदिर और पाठशाला के रखरखाव के लिए लगभग 100 बीघा जमीन दान किए जाने की बात कही जाती है। विजय कुमार दत्त बताते हैं कि शुरुआती दौर में यहां संस्कृत की पढ़ाई होती थी। बाद में संस्कृत पाठशाला का स्वरूप बदलकर सामान्य हिंदी विद्यालय के रूप में संचालित होने लगा। उनका कहना है कि आजादी के बाद सरकारी मान्यता मिलने पर यहां प्राथमिक विद्यालय के रूप में पढ़ाई शुरू हुई। शुरुआत में तीसरी कक्षा तक पढ़ाई होती थी। इसके बाद बच्चों को चौथी कक्षा में रंगलाल उच्च विद्यालय जाना पड़ता था। समय के साथ विद्यालय का विस्तार हुआ और यह मध्य विद्यालय के रूप में विकसित हुआ। **झोपड़ी से पक्के भवन तक पहुंचा विद्यालय, अब फिर बदहाली** स्थानीय लोगों के अनुसार, विद्यालय ने अपने लंबे सफर में कई बदलाव देखे हैं। शुरुआती दौर में पाठशाला मंदिर परिसर में संचालित होती थी। बाद में झोपड़ी और खपरैल के भवन में पढ़ाई हुई तथा धीरे-धीरे पक्के भवन का निर्माण हुआ। वर्ष 1932 को विद्यालय की स्थापना का वर्ष बताया जाता है। हालांकि, विजय कुमार दत्त के बयान से स्पष्ट होता है कि इसकी शैक्षणिक गतिविधियों की शुरुआत इससे पहले हुई थी। इस संबंध में पुराने अभिलेखों और दस्तावेजों से ही स्थापना तथा सरकारी मान्यता की सही तिथि की पुष्टि हो सकती है। **सरकारी निर्देश के बाद भी जमीन की मापी का इंतजार** राज्य के भवनहीन सरकारी विद्यालयों के लिए जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विकास आयुक्त मिहिर कुमार सिंह ने 29 अक्टूबर को सभी जिलाधिकारियों को पत्र जारी किया था। इसमें दान में मिली जमीन की मापी कराने और उस पर विद्यालय का कब्जा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था, ताकि जरूरत के अनुसार नए भवन का निर्माण कराया जा सके। ऐसे में ऐतिहासिक मध्य विद्यालय दुल्हिन मंदिर की जमीन की मापी और नए भवन का मामला और महत्वपूर्ण हो गया है। सवाल यह है कि जिस विद्यालय ने दशकों तक क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा दी, वहां आज 254 बच्चों को तीन कमरों में बैठकर पढ़ाई क्यों करनी पड़ रही है? आखिर जमीन की मापी, भवन निर्माण, पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति और बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था कब होगी? अब अभिभावकों और स्थानीय लोगों को शिक्षा विभाग तथा जिला प्रशासन की पहल का इंतजार है।

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